Friday, January 30, 2009

@वापसी.....

जो लाये है मुझे यहाँ 
वोह ले जायेंगे वापिस अब हमें .........
..
कहाँ से चली थी?....

मिटटी थी ,पर थे मेरे खिलोने ..
शायद छिपे है आज तक तसुवर में कहीं ...

खेली थी होली जिसके संग...
उन् सबके रंग उतरे या कभी कुछ और चढ़े..!

उठी थी डोली में सजके ...
वोह सफर तोह सात जन्मो का है --
अभी तक आप,हम,और "उहू"....तक ...जारी है अभी..!

जुड़ी थी जहाँ से पहचान मेरी .....
नदी की धारा जैसे ...रुकी नही,रूकती नही ,रुकेगी भी नही...!

जहाँ से चली थी 
वहां तो अब हूँ नही...................

जो लाये है मुझे यहाँ 
वोही लेजाएँगे वापिस अब हमें ..............!

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